"हम , भारत के लोग …… "/ " We, the people of India ..."

पैसा कामना इतना जरूर क्यों होता है? सुंदरता  इतनी सराही क्यों जाती है ? बेटे का किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करना माँ -बाप के लिए गर्व की बात क्यों होती है ? बेटी की शादी की अमीर से करना इतना जरूरी क्यों होता है ? ब्रांडेड कपड़े पहनना इतना जरूरी क्यों होता है। सुर्ख़ियों  में बने रहने का नशा शराब के नशे से ज्यादा क्यों होता है ? अपने मन को मारना जरूरी क्यों होता है ? और इन सब चीज़ो के लिए काम करना इनता जरूरी क्यों है?  मैं उस काम की बात कर रहा हूँ जहाँ पर काम के बदले पैसे मिलने की अपेक्षा की जाती है।  कभी - कभी लगता है कुछ भी न करो लेकिन ये सम्भव नहीं है।  हम आपस में जो रिश्ते बनाते हैं वो भी इस बात पर निर्भर करतें हैं  कि हम पैसा कितना कामतें हैं।  एक माँ - बाप भी यदि अपने बच्चे को आर्थिक रूप से मदद न करें तो बच्चा भी उन्हें स्वीकारने से मना कर देता है।  हमने गाना सुना "ये दौलत भी ले लो , ये शौहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी , मगर मुझको लौटा दो बचपन …।" यहाँ पर भी बचपन के बदले दौलत और शौहरत वापस की जा रही है।  यानी दौलत नहीं तो कुछ भी नहीं।   एक आर्थिक रूप से निर्धन व्यक्ति यदि किसी तथाकथित बड़े आदमी से दोस्ती करना चाहे तो नहीं कर सकता।  चुनाव के दौरान तो सभी लोग हीरो बन जातें हैं , चाहे वो आर्थिक रूप से सुद्रण हो या न हों।  लेकिन उसके बाद भले ही सारे काम राष्ट्रहित को सामने रख कर किये जाएँ लेकिन गरीब तो गरीब ही रहता है।

गरीबो की भी अलग -अलग श्रेणी होती है।  एक आर्थिक रूप से अमीर आदमी भी गरीब हो सकता है , यथा उसका कोई बच्चा नहीं है , उसका परिवार उसके साथ नहीं है।  कहने का तात्पर्य ये है की आर्थिक रूप से अमीर होने के बाद भी सामाजिक या पारवारिक क्षेत्र में वह गरीब हो सकता है।  और सबसे ज्यादा गरीब तो मिडिल क्लास होता है , जो है उसके पास उसमे संतुष्टि नहीं है और जो उसके पास नहीं है उसे पाने में पूरा जीवन भी कम लगता है।  और यदि कुछ अच्छा मिल  भी गया  तो नए सपने सोने नहीं देते।  इस मामले में तो लगता है आर्थिक रूप से गरीब लोग ज्यादा खुश हैं।  न कोई सपना है और कुछ खोने का डर है।  और तो और यहाँ पर समाज में दिखावे का भी डर नहीं है।  किसी स्टेटस सिम्बल के चक्कर में पैसे भी उधार लेने की जरूरत नहीं है।  परिवार में भी झगड़ा करने के लिए किसी संपत्ति का बटवारे का चक्कर नहीं है।

तो क्या बिना कुछ कमाए ज्यादा खुश रहा जा सकता है।  लेकिन भारत जैसे देश में हर पांच साल बाद जो व्यक्ति विशेष होने का गौरव प्राप्त होता है वही से कुछ कमाने या होने की लत लग जाती है।  और इसी चक्कर में अगले पांच साल तक मरते रहतें हैं।  समझ नहीं आता करें तो क्या करें ? वोट का अधिकार हमें हमारी उपयोगिता तो दिखाता है और हमें गौरवान्वित भी करता है कि हमारी भी कोई कीमत है, लेकिन उसके बाद फिर वही लगने लगता है की कोई हमे फ्री में भी नहीं खरीदेगा। आखिर दोषी कौन है पैसा या हम ?

खैर जब मैंने कीमत की बात कर ही दी है है तो यहाँ से उसी मानसिकता का पता चलता है की हम ही तो हैं जो सब चीज़ो के लिए पैसे चाहतें हैं।  यानी अपनी कीमत चाहतें हैं।  पैसा चाहतें हैं। अपने बेटे को मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हुए देखना चाहतें हैं।  अपनी लड़की की शादी अमीर आदमी से करना चाहतें हैं। सुर्ख़ियों में बने रहना चाहतें हैं।  अपने मन को मारने चाहतें हैं।  मतदान के दौरान हीरो बनना चाहतें हैं। अमीरो से दोस्ती करना चाहतें हैं।  यानी हम काम करना चाहतें हैं और ऐसा काम चाहतें है जहाँ हमें पैसे मिले।  जब सब कुछ हम ही चाहतें हैं तो फिर पैसे  को क्यों बदनाम करतें हैं।

यहाँ पर समस्या की जड़ "हम " ही हैं , तो फिर गर्व से कहना चाहिए "हम , भारत के लोग    …… "

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